झारखण्ड सरकार के पास उर्दू के विकास के लिए कोई योजना नहीं .. गाजी रहमतुल्लाह रहमत

 

झारखंड में उर्दू की स्थिति अति दयनीय है, सरकार उर्दू के विकास के लिए किसी भी तरह का कदम नहीं उठा रही है। उक्त बातें साहित्यकार परिषद के अध्यक्ष गाजी रहमतुल्लाह रहमत ने कही। उन्होंने कहा कि जितनी भी सरकारें झारखंड में आज तक बनी हैं, सभी का रवैया उर्दू के विकास के प्रति उदासीन ही रहा है।

उन्होंने कहा कि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने सन 1917 ईस्वी में अंजुमन इस्लामिया की स्थापना रांची में की साथ ही साथ मदरसा इस्लामिया की बुनियाद भी रखी जहां पर उर्दू की पढ़ाई की व्यवस्था आपसी सहयोग से शुरू कराई। यह क्रम चलता रहा तत्पश्चात सन 1939 ईस्वी में अंजुमन तरक्की उर्दू हिंद की तरफ से बाबा ए उर्दू मौलवी अब्दुल हक साहब ने सुहेल अजीमाबादी को रांची भेजा तथा उर्दू के विकास और संवर्धन के लिए कार्यक्रम और आंदोलन चलाने की सलाह दी । सुहेल अजीमाबादी साहब ने 1939 से लेकर 1949 तक रांची में रहकर उर्दू के विकास के लिए सराहनीय कार्य किया । सन 1960 ईस्वी में रांची विश्वविद्यालय की स्थापना हुई लेकिन उर्दू का विभाग 12 वर्षों बाद खोला गया और विभागाध्यक्ष के रूप में समीउल हक साहब को नियुक्त किया गया लेकिन उर्दू के विकास में सराहनीय कार्य नहीं हो सका क्योंकि संसाधन की घोर कमी रही। बाद में उर्दू के विभागाध्यक्ष वहाब अशरफी साहब बने । उन्होंने अपने स्तर से उर्दू के विकास के लिए कार्य किया। उनके सफल प्रयास और प्रभाव से प्रोफेसर अहमद सज्जाद, प्रोफेसर अबूजर उस्मानी, समीउल हक, शीन अख्तर वगैरह ने उर्दू के विकास के लिए कार्य किया। बाद में सिद्दीक मुजीबी, डॉक्टर हसन रजा अब्दुल कयूम अब्दाली, डॉक्टर जमशेद कमर, ताहा शमीम, डॉक्टर शहनाज राणा, डॉक्टर कहकशां परवीन, डॉ सरवर साजिद जैसे रचनाकारों और अदीबों ने उर्दू के विकास के लिए कार्य किया। गाज़ी रहमत ने कहा कि झारखंड में उर्दू का जो कुछ भी काम हुआ है वाह रचनाकारों की अपनी मेहनत और प्रयास का प्रतिफल है । सरकार की तरफ से उर्दू के प्रति बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि सन 1977 ईस्वी में तृतीय ऑल इंडिया उर्दू यूनिवर्सिटी टीचर्स का कॉन्फ्रेंस रांची में हुआ जिसमें उर्दू के विकास के लिए लंबा चौड़ा प्लान बनाया गया लेकिन ढाक के तीन पात ही रहे क्योंकि सरकार की तरफ से सहयोग ना के बराबर प्राप्त हो सका। उन्होंने कहा कि 10 जनवरी 1992 को सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई लेकिन आज तक उर्दू के लिए विश्वविद्यालय की तरफ से कोई सराहनीय कदम नहीं उठाया जा सका। आज भी उसके अंतर्गत आने वाले अंगीभूत एवं मान्यता प्राप्त महाविद्यालयों में उर्दू की कमी जस की तस बनी हुई है।जामताड़ा महाविद्यालय इसका जीता जागता उदाहरण है। 17 सितंबर 1992 ईस्वी को विनोबा भावे विश्वविद्यालय की स्थापना हुई वहां पर पहले से ही उर्दू की स्थिति अच्छी थी और यह क्रम अभी तक ठीक ठाक चलता आ रहा है हालांकि जब मैं संत कोलंबस कॉलेज हजारीबाग में था उस समय उर्दू की स्थिति जितनी अच्छी थी उतनी अच्छी अभी नहीं है । यह स्वीकारने में मुझे कोई हिचक नहीं कि विश्वविद्यालय के डॉक्टर हुमायूं अशरफ ने अपने स्तर से काफी अच्छा काम किया है और वर्तमान उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ जैन रामिश के कार्य भी सराहनीय हैं। उन्होंने कहा कि सन 2007 में झारखंड प्रदेश में दो यूनिवर्सिटी पलामू और चाईबासा में बनीं। नीलांबर पीतांबर यूनिवर्सिटी पलामू के उर्दू विभागाध्यक्ष डॉक्टर ए जे खान और कोल्हान यूनिवर्सिटी, चाईबासा की उर्दू विभागाध्यक्ष रुकैया बानो की तरफ से आज तक उर्दू के विकास से संबंधित किसी भी तरह के कार्यक्रम और योजना सुनने और देखने को नहीं मिले हैं । इससे साफ पता चलता है कि सरकार की तरफ से उर्दू के लिए सिर्फ और सिर्फ खानापूर्ति की जाती है। गाज़ी रहमत ने कहा कि झारखंड की सरकार उर्दू के प्रति कितना उदासीन है इसे सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि 2009 में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड की स्थापना रांची में हुई है जिसमें आज तक उर्दू का विभाग नहीं खोला गया जबकि चाइनीज़, कोरियन, तिब्बतियन, अंग्रेजी आदि के विभाग बहुत पहले खुल चुके हैं। झारखंड बने दो दशक पार हो चुके लेकिन आज तक ना तो उर्दू अकादमी की स्थापना हो सकी और ना ही मदरसा बोर्ड कायम हो सका। उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों को हिंदी माध्यम की किताबें पढ़ाई जाती हैं। झारखंड शिक्षा परियोजना की तरफ से उर्दू माध्यम से किताबें छापने का कोई सिस्टम ही नहीं है। होना तो यह चाहिए था कि उर्दू माध्यम से सभी विषयों की किताबें छापी जातीं और पठन-पाठन की व्यवस्था कराई जाती लेकिन झारखंड सरकार की उर्दू के प्रति उदासीनता ऐसा नहीं होने देती।

उन्होंने कहा कि अगर सरकार अपना रवैया नहीं बदलती है और उर्दू के विकास के लिए कोई समेकित योजना नहीं बनाती है तो हम उर्दू प्रेमियों को अपनी भाषा और संस्कृति के विकास हेतु आगे आना पड़ेगा और सरकार की उर्दू के प्रति उदासीनता को जगजाहिर करते हुए उनके खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा वरना हमारी भाषा और संस्कृति खत्म हो जाएगी और हमें किसी दूसरी भाषा और संस्कृति का गुलाम बनना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार हमारी भाषा और संस्कृति को खत्म कर हमें गुलाम बनाना चाहती है और गुलामी हमें पसंद नहीं। इसके लिए चरणबद्ध आंदोलन खड़ा किया जाएगा।

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